भील राजा डुगर बरंण्डा बलिदान दिवस - 30 अक्टूबर 1292

आज से 725साल पहले डूंगरपुर ''राज' भील प्रदेश "डुन्गर नू घेर" या "पाल" से जाना जाता था। यहा भील आदिवासीयो की तमाम पालो के गमेती ने राजा डुगर को नियुक्त किया था। खुशहाल आदिवासी राज था। उसी समय मे एक बनिया व्यापार करने के लिये शालासाह थाना गाव आया उसकी एक खूबसूरत कन्या थी। राजा ने उससे विवाह का प्रस्ताव भेजा। बनिया मान गया पर उसने आसपुर-बडोदा के ठीकाने के सामन्तवाद राजपुत से मिलकर भीलराजा को मारने का षडयंत्र रचा। इसी शुक्लदशमी सवन्त 1336 के दिन शादी तय थी राजा बरात लेकर पहुचे।मनुहार मे अत्य्धिक मद वाली मदिरा बारातियो को पिलाई। राजा ने नही पी थी।अचानक राजपुतो ने हमला कर दिया बाराती मारे गये राजा लडते हुऐ डूंगरपुर पहुचे।उनकी दो रानिया "धनू" और "काली" भी सामने वाली पहाड पर लडते हुए वीरगती को प्राप्त हुई। राजा पहाड कि चोटी से मात्र 5 मीटर की दूरी पर पीछे से वार करने से मारे गये।वही उनकी याद मे छतरी बनी हुइ हे।और इसके बाद राजपुतो ने अपने नाम से राज किया और दूसरे दिन से उनके नाम से नामकरन किया उस दिन से स्थापना दिवस मनाते हे!

पहले दिन आदिवासी शहादत दिन दूसरे दिन स्थापना दिवस गेर आदिवासी द्रारा कहानी साफ़ है।

डूंगरपुर की गवर्नमेंट साईट पर साफ लिखा है की डुगरपुर की स्थापना डुंगरिया भील ने की थी।

।।आदिवासी अपना सही ईतिहास अतीत जानो।।

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जय आदीवासी सच्चा आदीवासी वो हे जो आदीवासी समाज को लेकर चले ओर जो हमारे आस पास के छोटे छोटे गाव मे धर्म परीर्वतन तेजी से हवा की तरह फेल रहा हे उसे रोके तभी आदीवासी की सही पहचान होगी जय .वीर .....

आपका ़आदीवासी भाई

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